Bihar में PK की जन सुराज को झटका, Supreme Court ने कहा- लोकतांत्रिक प्रक्रिया का मजाक न बनाएं

Prashant Kishore
ANI
Neha Mehta । Feb 7 2026 10:53AM

सुप्रीम कोर्ट ने प्रशांत किशोर की पार्टी 'जन सुराज' की बिहार चुनाव रद्द करने की याचिका को खारिज करते हुए इसे चुनावी हार के बाद का 'पब्लिसिटी स्टंट' करार दिया है। अदालत ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि जनता द्वारा नकारे जाने के बाद लोकतांत्रिक प्रक्रिया का मजाक नहीं बनाया जा सकता।

राजनीति के चाणक्य कहे जाने वाले प्रशांत किशोर (PK) और उनकी पार्टी 'जन सुराज' को देश की सबसे बड़ी अदालत से करारा झटका लगा है। बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के नतीजों को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया और याचिका को खारिज कर दिया।

क्या था पूरा मामला?

प्रशांत किशोर की पार्टी ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाते हुए मांग की थी कि बिहार के पूरे चुनाव को रद्द कर दिया जाए। उनका आरोप था कि नीतीश सरकार ने चुनाव आचार संहिता के दौरान महिलाओं को 10-10 हजार रुपये बांटकर वोटरों को लुभाया है। 'जन सुराज' का कहना था कि यह सीधे तौर पर भ्रष्टाचार है और इससे चुनाव की निष्पक्षता खत्म हो गई है।

सुप्रीम कोर्ट की तीखी टिप्पणी

मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने प्रशांत किशोर की पार्टी की दलीलों पर पानी फेर दिया। कोर्ट ने जो कहा, वह किसी राजनीतिक झटके से कम नहीं था:

  • जनता ने रिजेक्ट किया, तो अब कोर्ट आए?: कोर्ट ने सवाल उठाया कि आपकी पार्टी को कितने वोट मिले? जब जनता ने आपको नकार दिया, तो क्या अब आप कोर्ट का इस्तेमाल सिर्फ चर्चा बटोरने या लोकप्रियता पाने के लिए कर रहे हैं?
  • पूरी चुनाव प्रक्रिया को मजाक न बनाएं: बेंच ने साफ किया कि अगर आपको किसी योजना से दिक्कत थी, तो उसे पहले चुनौती देनी चाहिए थी। अब चुनाव हारने के बाद पूरी लोकतांत्रिक प्रक्रिया को रद्द करने की मांग करना "बचकाना" है।

अब आगे क्या?

सुप्रीम कोर्ट ने प्रशांत किशोर को सलाह दी कि अगर उन्हें अभी भी लगता है कि धांधली हुई है, तो वे पटना हाई कोर्ट जा सकते हैं। कोर्ट ने साफ कर दिया कि चुनाव आयोग की स्वायत्तता और लोकतांत्रिक प्रक्रिया का सम्मान करना हर राजनीतिक दल की जिम्मेदारी है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि जेरेड लेटो के 'स्केलेटर' की तरह प्रशांत किशोर ने भी सत्ता के खेल में एक "एग्रेसिव" चाल चली थी, लेकिन न्यायपालिका ने यह स्पष्ट कर दिया है कि चुनाव का फैसला मैदान में होता है, अदालत में नहीं। अब देखना होगा कि पीके अपनी रणनीति में क्या बदलाव लाते हैं।

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