दिल्ली शराब घोटाला मामले में Kejriwal और CBI के वकीलों ने क्या तर्क दिये थे? केस से कौन-कौन लोग बरी हुए?

सुनवाई के दौरान सीबीआई की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल डीपी सिंह और अधिवक्ता मनु मिश्रा ने पक्ष रखा। एजेंसी ने अदालत में तर्क दिया कि आपराधिक साजिश के अपराध को समग्रता में देखा जाना चाहिए और साक्ष्यों की पर्याप्तता का परीक्षण मुकदमे के दौरान किया जाना चाहिए।
दिल्ली शराब घोटाला मामले में राउज एवेन्यू कोर्ट ने आज पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया को बड़ी राहत देते हुए बरी कर दिया। विशेष न्यायाधीश जितेंद्र सिंह ने सीबीआई द्वारा दर्ज मामले में यह फैसला सुनाया। हम आपको याद दिला दें कि अदालत ने 12 फरवरी को सीबीआई और सभी आरोपितों की विस्तृत दलीलें सुनने के बाद आदेश सुरक्षित रख लिया था, जिसे आज सुनाया गया।
यह मामला वर्ष 2022 की दिल्ली आबकारी नीति से जुड़ा है, जिसे बाद में रद्द कर दिया गया था। जब यह मामला दर्ज किया गया था, उस समय केजरीवाल मुख्यमंत्री और सिसोदिया उपमुख्यमंत्री के पद पर कार्यरत थे। जांच एजेंसी सीबीआई ने 2022 में पहला आरोप पत्र दाखिल किया था, जिसके बाद कई अनुपूरक आरोप पत्र भी दायर किए गए। एजेंसी का आरोप था कि दक्षिण लॉबी नामक समूह ने नीति को अपने पक्ष में प्रभावित करने के लिए 100 करोड़ रुपये का भुगतान किया।
सीबीआई ने कुल 23 आरोपितों के विरुद्ध आरोप पत्र दायर किए थे। इनमें केजरीवाल और सिसोदिया के अलावा के. कविता, कुलदीप सिंह, नरेंद्र सिंह, विजय नायर, अभिषेक बोइनपल्ली, अरुण रामचंद्र पिल्लई, मूथा गौतम, समीर महेंद्रु, अमनदीप सिंह ढल, अर्जुन पांडे, बुच्चीबाबू गोरंटला, राकेश जोशी, दामोदर प्रसाद शर्मा, प्रिंस कुमार, चनप्रीत सिंह रायट, अरविंद कुमार सिंह, दुर्गेश पाठक, अमित अरोरा, विनोद चौहान, आशीष माथुर और पी सरथ चंद्र रेड्डी के नाम शामिल थे।
सुनवाई के दौरान सीबीआई की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल डीपी सिंह और अधिवक्ता मनु मिश्रा ने पक्ष रखा। एजेंसी ने अदालत में तर्क दिया कि आपराधिक साजिश के अपराध को समग्रता में देखा जाना चाहिए और साक्ष्यों की पर्याप्तता का परीक्षण मुकदमे के दौरान किया जाना चाहिए। सीबीआई का कहना था कि सभी आरोपितों के विरुद्ध आरोप तय करने के लिए पर्याप्त सामग्री मौजूद है।
वहीं केजरीवाल की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता एन. हरिहरन ने दलील दी कि उनके मुवक्किल को कथित साजिश से जोड़ने वाला कोई ठोस या आपराधिक सामग्री उपलब्ध नहीं है। उन्होंने कहा कि चौथे अनुपूरक आरोप पत्र में केजरीवाल का नाम जोड़ा गया, जो पूर्व आरोपों की पुनरावृत्ति मात्र है। हरिहरन ने यह भी तर्क दिया कि केजरीवाल अपना आधिकारिक कर्तव्य निभा रहे थे और नीति निर्माण सरकार की सामूहिक प्रक्रिया का हिस्सा था।
बचाव पक्ष ने इस तथ्य पर भी जोर दिया कि प्रारंभिक आरोप पत्र और तीन अनुपूरक आरोप पत्रों में केजरीवाल का नाम नहीं था। उनका नाम केवल चौथे अनुपूरक आरोप पत्र में सामने आया। बचाव पक्ष ने आगे की जांच की आवश्यकता और आधार पर भी प्रश्न उठाए तथा सरकारी गवाह राघव मगुंटा के बयान सहित अन्य बयानों की साक्ष्यात्मक महत्ता पर संदेह व्यक्त किया।
अदालत ने सभी पक्षों की दलीलें सुनने और प्रस्तुत दस्तावेजों का अवलोकन करने के बाद यह निष्कर्ष निकाला कि उपलब्ध सामग्री आरोप तय करने के लिए पर्याप्त नहीं है। इसी आधार पर अदालत ने केजरीवाल और सिसोदिया को आरोपों से मुक्त कर दिया। इस फैसले के साथ ही इस बहुचर्चित मामले में एक महत्वपूर्ण अध्याय समाप्त हो गया।
फैसले के बाद राजनीतिक हलकों में व्यापक प्रतिक्रिया देखी गई। आम आदमी पार्टी ने इसे सत्य की जीत बताया, जबकि विरोधी दलों ने मामले के व्यापक पहलुओं पर चर्चा की आवश्यकता जताई। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय जांच एजेंसियों के लिए भी महत्वपूर्ण संकेत है कि आरोप पत्र दाखिल करते समय साक्ष्यों की मजबूती अत्यंत आवश्यक है। हालांकि आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या जांच एजेंसी इस आदेश को उच्च न्यायालय में चुनौती देती है या नहीं। फिलहाल राउज एवेन्यू अदालत का यह फैसला राजधानी की राजनीति पर दूरगामी प्रभाव डाल सकता है।
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