यह कैसा समाज है, जिसमें अदालतें समझाएं रिश्तों का धर्म
आज की सबसे बड़ी चुनौती केवल आर्थिक नहीं, बल्कि भावनात्मक निर्धनता की है। नई पीढ़ी का एक बड़ा वर्ग आत्मकेंद्रित होता जा रहा है। भौतिक उपलब्धियाँ, कैरियर, उपभोगवाद और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की अवधारणाएँ जीवन के केंद्र में आ गई हैं। संयुक्त परिवार टूट रहे हैं, रिश्तों की ऊष्मा कम हो रही है और संवाद का स्थान डिजिटल माध्यम ले रहे हैं।



























































