वैश्विक औसत से बहुत दूर है सत्ता में महिलाओं की भागीदारी
खैर इससे यह तस्वीर साफ हो जानी चाहिए कि जब तक संवैधानिक बाध्यता नहीं होगी तब तक महिलाओं की भागीदारी लाख प्रयासों के बावजूद नहीं बढ़ने वाली है। इसके लिए एक सीमा तक सीटों का आरक्षण करना ही होगा। इसका जीता जागता उदाहरण पंचायतीराज व स्थानीय स्वशासन संस्थाएं है।



























































