शीर्ष नेतृत्व के फैसले को दरकिनार कर येदियुरप्पा ऑपरेशन कमल 2.0 को देंगे अंजाम?

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अभिनय आकाश । Jul 2 2019 6:25PM

पार्टी शीर्ष नेतृत्व सरकार गिरने की स्थिति में जोड़-तोड़ की सरकार बनाने की बजाए फिर से चुनाव में जाने पर विचार कर रही है। लेकिन 76 साल के कर्नाटक भाजपा के सबसे बड़े नेता बीएस येदियुरप्पा लगातार यह बयान दे रहे हैं कि अगर सरकार गिर जाती है तो हम सरकार बनाने की सारी संभावनाएं तलाशेंगे लेकिन नए चुनाव का कोई सवाल ही नहीं है।

कर्नाटक का सियासी नाटक रोज-रोज नए-नए रूप में सामने आ रहा है। एक के बाद एक विधायकों के इस्तीफों का सिलसिला चल रहा है। कांग्रेस से नाराज चल रहे विधायक रमेश जरकिहोली के अलावा आनंद सिंह ने भी इस्तीफा दे दिया है। जिसके बाद फिर से प्रदेश में सियासी संकट मंडराने लगा है। इस्तीफे के बाद राज्य में कांग्रेस के 77 विधायक बचे हैं जबकि जेडीएस के 37 विधायक हैं। कुल 224 सीटों वाले कर्नाटक में बहुमत का आंकड़ा 113 का है और फिलहाल कांग्रेस-जेडीएस गठबंधन के पास 114 विधायक हैं, यानि बहुमत से एक ज्यादा। सबसे बड़ी पार्टी भाजपा के पास फ़िलहाल 105 विधायक हैं। जहां कर्नाटक में उठते सियासी उठा-पटक के बीच सूबे के मुख्यमंत्री एच डी कुमारस्वामी अमेरिका में एक मंदिर की नींव रखने के कार्यक्रम में गए हुए हैं और उनके 6-7 जुलाई को लौटने की संभावना है। वहीं कांग्रेस विधायकों के इस्तीफे के बाद पार्टी विधायक दल के नेता सिद्धारमैया ने बेंगलुरु में अपने आवास पर विधायक दल की बैठक बुलाई और इस सारे घटनाक्रम के लिए नरेंद्र मोदी और अमित शाह को दोषी ठहराया।

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लेकिन कर्नाटक की राजनीति भी अजीब है। नरेंद्र मोदी और अमित शाह पर लगे इल्जाम को कांग्रेस की सहयोगी जेडीएस के मंत्री ने खारिज कर दिया। कर्नाटक सरकार में मंत्री जीटी देवगौड़ा ने विधायकों के इस्तीफे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह का हाथ नहीं होने की बात कहते हुए कहा कि विपक्ष सरकार को अस्थिर करने में शामिल नहीं है। इसके अलावा उन्होंने पीएम मोदी की शान में कसीदे भी पढ़े। देवगौड़ा ने कहा कि आपने देखा होगा कि पीएम ने जब से शपथ ली है तब से वो देश, कश्मीर, अमेरिका, चीन के बारे में सोच रहे हैं। पीएम पूरी तरह से बजट बनाने में शामिल हैं। कोई भी भाजपा को दोष नहीं दे सकता। 

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अब इस बयान ने राजनीतिक विश्लेषकों को और मायने निकालने का मसाला दे दिया। वैसे प्रदेश की राजनीति में जो भी खिचड़ी पक रही हो लेकिन आनंद सिंह और रमेश जरकिहोली के इस्तीफे के बाद कांग्रेस के विधायक बी नागेन्द्र और महेश कुमठाहल्ली, बीसी पाटिल, गणेश, बसवन्ना दड्डल के भी इस्तीफा देने की खबरें सामने आ रही हैं और आने वाले दिनों में विधायक कांग्रेस को और झटके दे सकते हैं।

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हालांकि खबरों के अनुसार पार्टी शीर्ष नेतृत्व सरकार गिरने की स्थिति में जोड़-तोड़ की सरकार बनाने की बजाए फिर से चुनाव में जाने पर विचार कर रही है। लेकिन 76 साल के कर्नाटक भाजपा के सबसे बड़े नेता बीएस येदियुरप्पा लगातार यह बयान दे रहे हैं कि अगर सरकार गिर जाती है तो हम सरकार बनाने की सारी संभावनाएं तलाशेंगे लेकिन नए चुनाव का कोई सवाल ही नहीं है। बता दें कि मई 2018 में भी पूर्ण बहुमत न होने के बावजूद सरकार गठन का निर्णय येदियुरप्पा की जिद की वजह से लिया गया था। जिसके बाद भाजपा को फजीहत भी झेलनी पड़ी थी और केंद्रीय नेतृत्व इससे नाराज भी था। ऐसे में क्या इस बार फिर येदियुरप्पा का ऑपरेशन कमल 2.0 देखने को मिल सकता है। 

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कर्नाटक के राजनीतिक इतिहास पर नज़र डालें तो पिछले 15 सालों में इस प्रदेश ने 9 मुख्यमंत्रियों को देखा है। गौरतलब है कि 2004 में कांग्रेस को 65 सीटें मिली थीं, तब भी भाजपा 79 सीटें पाकर सबसे बड़ी पार्टी थी। लेकिन 65 सीटें पाने वाली कांग्रेस ने उस समय 58 सीटें पाने वाली तीसरे नंबर की पार्टी से ढाई-ढाई साल मुख्यमंत्री पद पर रहने का समझौता कर सत्ता हासिल की थी। लेकिन 20 माह पूरे होते-होते ही कांग्रेस ने आज के निवर्तमान मुख्यमंत्री एवं तब जनता दल (एस) के कोटे से मंत्री एस सिद्दारमैया के माध्यम से जेडीएस में ही सेंध लगाना शुरू कर दिया था।

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उसके बाद तब के उपमुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी ने भाजपा नेता बीएस येदियुरप्पा के साथ 20-20 महीने मुख्यमंत्री रहकर उस विधानसभा का कार्यकाल पूरा करने का समझौता किया था। लेकिन कांग्रेस से धोखा खाए कुमारस्वामी ने भी 20 माह बाद भाजपा को धोखा ही दिया। येदियुरप्पा की बारी आने पर उन्हें मुख्यमंत्री पद की शपथ तो लेने दी, लेकिन सदन में समर्थन देने से कतरा गए और 19 नवंबर, 2007 को येदियुरप्पा सरकार गिर गई थी।

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इसके बाद वर्ष 2008 में हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा को शानदार जीत मिली और येदियुरप्पा 30 मई, 2008 को दूसरी बार कर्नाटक के मुख्यमंत्री बन गए। बाद में भ्रष्टाचार के मामलों में नाम आने पर 31 जुलाई, 2011 को येदियुरप्पा की जगह सदानंद गौड़ा को मुख्यमंत्री बनाया गया था। साल 2013 में कांग्रेस सत्ता में आई और सिद्धारमैया मुख्यमंत्री बने। लेकिन अलग पार्टी बना चुके येदियुरप्पा की 2014 में पार्टी में वापसी होती है। फिर 2018 का विधानसभा चुनाव उन्हीं के नेतृत्व में लड़ा जाता है। लेकिन मई 2018 को कर्नाटक के नतीजे आने के बाद से 3 दिन तक सियासी नाटक देखने को मिलता है। पहले तो येदियुरप्पा सीएम पद की शपथ लेते हैं। बहुमत जुटाने की कोशिश में भाजपा पर विधायकों की खरीद-फरोख्त और विधायकों को बंधक बनाने जैसे आरोप लगते हैं।

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राज्यपाल द्वारा सबसे बड़े गठबंधन की बजाए सबसे बड़े दल को बुलाए जाने और बहुमत साबित करने के लिए 15 दिन का समय देने के साथ ही प्रोटेम स्पीकर की नियुक्ति जैसे फैसलों के लिए राजभवन पर सवाल उठाते हुए कांग्रेस-जेडीएस आधी रात को सुप्रीम कोर्ट के दरवाजे पर दस्तक का गवाह बनी थी कर्नाटक की सियासत। जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट द्वारा पहले शपथ लेने के 48 घंटे के भीतर येदियुरप्पा को सदन में बहुमत साबित करने का आदेश दिया साथ ही विधानसभा की कार्यवाही के लाइव प्रसारण के भी आदेश दिए। परिणाम स्वरूप जरूरी समर्थन जुटाने में नाकाम होते देख मुख्यमंत्री येदियुरप्पा ने इस्तीफा देना ही उचित समझा। बीएस येदियुरप्पा अपने 20 मिनट के भावुक भाषण और इस्तीफे के ऐलान के साथ दोबारा वापसी की बता कह गए थे।

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